SAHIL's poem..on NDTV
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Saturday, August 2, 2008

याद है तुम्हे
तब तुम कहाँ थी
तब मैं कहाँ था
जब उस खंडहर की मुंडेर के किनारे
झील में दो प्रतिबिम्बों को देखकर
एक रहस्य मुस्कुरा रहा था
जब मैं लिख रहा था एक गीत
तुम्हारी देह पर अपने होंठों से
जब तुम्हारे सुवासित गेसुओं की सुगंध
मेरी साँसों में घुल रही थी
और तुम्हारी जिव्हा मेरी गर्दन पर
पिघल रही थी
मेरे हाथ जब तुम्हे कसकर पकडे हुए थे
जब तुम काट रही थी मेरे कन्धों को हौले से
याद है तुम्हे
तब तुम कहाँ थी
तब मैं कहाँ था
उस पल ....
- साहिल
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