Sunday, April 11, 2010



जब भी तुम सामने आती
सोचता ...
मन कि बात कह दूँ
कुछ हंसकर, मनाकर
गालों को छूकर
दिल के हालत कह दूँ
मगर पल ही में
लब सिल जाते
और सागर की लहरों की तरह
बेचैन हो करता तुम्हारा
अभिवादन ...
आगे बढ़ा हाथ
होंठों पर रुकी बात
करती तुम्हे विदा भी
जाते ही तुम्हारे
होंठ बुदबुदाते हैं -
'तुम ही पहल करो '
- साहिल

काश

काश तुम्हे कर पता मुक्त
इस पिंजरे से दूर कहीं नभ में ....
पा जाती तुम अपना विस्तार
कर पाती स्वपन पूर्ण, इच्छाएं साकार
नयन तुम्हारे और चंचल हो जाते
और अंग खिल के कँवल हो पाते
काश इन बन्धनों से दूर
कर पाती मेरे आलिंगन में विश्राम
देह कमनीय पा जाती सम्मान
जान पाती स्व अस्तित्व ...
वाणी तुम्हारी और झंकृत हो जाती
या फिर खिलखिलाकर ही तुम हंस पाती
नीर थमा है नयनो में जो
काश सुधा में बदल देता मैं
द्रष्टि पड़े जहाँ तुम्हारी
बसंत कर देता मैं
पुष्प हो बगिया है तुमारा निवास
कर रही क्या कंटको में
चली आओ मेरे पास
अनभिज्ञ हूँ क्यूँ ढालता भिन्न रूपों में
तुम्हारा रूप
अरुणारी सांझ में ज्यों
उठता पूनो का चाँद अनूप
क्यों हर क्षण स्पर्श तुम्हारा
महसूसता हूँ आस पास
मुख बिम्बित हर दिशा
तीव्र हो रही श्वास
सुगंध मुझको तुम्हारी छूती है
नहीं क्या ये प्रेम कि अनुभूति है ?




सागर किनारे
ख्यालों के बादल
उस पार नाव खेते जा रहे हैं
सरसराती
हवा उन्हें
उनकी
मंजिल तक धकेल रही है
राह
में पत्थर हैं
नुकीली
यादों की तरह
हवा
भीगी हुई है
और
खिड़की से आकर मेरे बालों को छु रही है
मैं
बादलों को नयनो से थामे हूँ
रोशनी
है कि सो गयी है चादर तान कर
चाँद
सर पे खड़ा है
मुझे
सब याद है !
सागर
किनारे
हम
दोनों चुप
तारों
को देख रहे
हाथों
में लिए हाथ
तुमने
हौले से मेरा नाम पुकारा
मैंने
तुम्हे देखा
तुम हौले से मुस्काई
और
हौले से चूम लिया मुझको
मुझे
सब याद है
मेरी
साँसे थमी हैं
ये
अकेली रात और यादें
मेरी
आत्मा को लपेट लो
इस
रात को चूम लो .....