(ओशो ऑडिटोरियम के बाहर संध्या - ध्यान के समय )
पृथ्वी के सबसे खूबसूरत लोग
परी देश की कथाओं की तरह
आते हैं यहाँ
मौन धारे मुस्कुराते
जलते दीयों के बीच
संगीत की स्वर - लहरियों के संग
उठता है फ़िर एक उन्माद
और खो जाते हैं एक
अनजानी दुनिया में
जहाँ न संगीत रहता है
और न नृतक
बस फ़ैल जाता है नृत्य ही चारों तरफ़
और एक स्वर
मौन भाषा में करतें हैं स्वागत
एक रहस्य का
वो रहस्य...
जो परिचित है ... अपना है
जो परिचित है ... अपना है
बसा है कहीं अंतरतम में ...
- सुनील साहिल

