Tuesday, August 5, 2008


पल पल रूपल

फडफडा रहा है

तुम्हारी यादों का पंछी

मेरे जेहन में और ले जाता है

मेरा हाथ पकड़कर

तुम्हारी सुवास के आकाश में

तुम्हारे अक्स की छुअन

टटोलती है मेरी चेतना को

और तुम्हारी आवाज की मिश्री

घुल जाती है मेरी श्वास में

तुम्हारे आलिंगन के छोटे छोटे पाँव

दौड़ रहे हैं मेरी देह में अब भी

बरस रही हो बूँदें बनकर

मेरे हृदय के आँगन में

तैर रहा हूँ आँखें मूंदें

तुम्हारी स्मृतियाँ के अनंत में

की गिरा देता है ज़मीन पर एक हाथ

मेरी पीठ थपथपाकर और कहता है -

'ऐ ...चलना नही है क्या ?'

और मैं हूँ कि बुदबुदा उठता हूँ -

' हाँ..चलना तो है

वो भी यदि साथ चले तो...

और पीछे मुड़कर देखता हूँ तो बस

एक ख्वाब खड़ा मुस्करा रहा था ....

- साहिल