
पल पल रूपल
फडफडा रहा है
तुम्हारी यादों का पंछी
मेरे जेहन में और ले जाता है
मेरा हाथ पकड़कर
तुम्हारी सुवास के आकाश में
तुम्हारे अक्स की छुअन
टटोलती है मेरी चेतना को
और तुम्हारी आवाज की मिश्री
घुल जाती है मेरी श्वास में
तुम्हारे आलिंगन के छोटे छोटे पाँव
दौड़ रहे हैं मेरी देह में अब भी
बरस रही हो बूँदें बनकर
मेरे हृदय के आँगन में
तैर रहा हूँ आँखें मूंदें
तुम्हारी स्मृतियाँ के अनंत में
की गिरा देता है ज़मीन पर एक हाथ
मेरी पीठ थपथपाकर और कहता है -
'ऐ ...चलना नही है क्या ?'
और मैं हूँ कि बुदबुदा उठता हूँ -
' हाँ..चलना तो है
वो भी यदि साथ चले तो...
और पीछे मुड़कर देखता हूँ तो बस
एक ख्वाब खड़ा मुस्करा रहा था ....
- साहिल