Wednesday, August 6, 2008



उठो भी अब

मन में भी एक झरना बहता है

फैली असीम नीरवता के किस्से कहता है

कोयल की कूक में भी सुनता है

अपने चेतन का गायन

सफ़ेद रुई सा बगुला अपनी चोंच डालता है

दरिया के पानी में और उसके छींटे

पड़ते हैं मेरे भीतर

लताएँ, फूल, डालियाँ और पत्तों ने

कह दी कई अनकही गाथाएँ

और कोई बुद्ध ध्यानमग्न है ज्यों

नही उठेगा अब भोर होने से पहले

बूढे वृक्षों की लम्बी शाखाओं को

छू लेता है मेरा किलकारी मारता मन

उठो भी अब ...

नया जनम हुआ है !

- साहिल


Tuesday, August 5, 2008


पल पल रूपल

फडफडा रहा है

तुम्हारी यादों का पंछी

मेरे जेहन में और ले जाता है

मेरा हाथ पकड़कर

तुम्हारी सुवास के आकाश में

तुम्हारे अक्स की छुअन

टटोलती है मेरी चेतना को

और तुम्हारी आवाज की मिश्री

घुल जाती है मेरी श्वास में

तुम्हारे आलिंगन के छोटे छोटे पाँव

दौड़ रहे हैं मेरी देह में अब भी

बरस रही हो बूँदें बनकर

मेरे हृदय के आँगन में

तैर रहा हूँ आँखें मूंदें

तुम्हारी स्मृतियाँ के अनंत में

की गिरा देता है ज़मीन पर एक हाथ

मेरी पीठ थपथपाकर और कहता है -

'ऐ ...चलना नही है क्या ?'

और मैं हूँ कि बुदबुदा उठता हूँ -

' हाँ..चलना तो है

वो भी यदि साथ चले तो...

और पीछे मुड़कर देखता हूँ तो बस

एक ख्वाब खड़ा मुस्करा रहा था ....

- साहिल

Monday, August 4, 2008


झंकृत हो गयी देह, छेड़े जब से तुने तार !!

स्वयं से हो गया नेह, अब आ पाउँगा उस पार !!

Saturday, August 2, 2008

SAHIL's poem..on NDTV
www.ndtv.com/ent/bookspoetrycorner.asp?id=997

for SUNIL SAHIL's Hindi Poems -

http://www.anubhuti-hindi।org/kavi/s/sunil_sahil/index.htm




याद है तुम्हे

तब तुम कहाँ थी

तब मैं कहाँ था

जब उस खंडहर की मुंडेर के किनारे

झील में दो प्रतिबिम्बों को देखकर

एक रहस्य मुस्कुरा रहा था

जब मैं लिख रहा था एक गीत

तुम्हारी देह पर अपने होंठों से

जब तुम्हारे सुवासित गेसुओं की सुगंध

मेरी साँसों में घुल रही थी

और तुम्हारी जिव्हा मेरी गर्दन पर

पिघल रही थी

मेरे हाथ जब तुम्हे कसकर पकडे हुए थे

जब तुम काट रही थी मेरे कन्धों को हौले से

याद है तुम्हे

तब तुम कहाँ थी

तब मैं कहाँ था

उस पल ....

- साहिल



चलो आओ नृत्य करें
रात्री के गीत के लिए
अपनी देहों के साथ
गुथे हुए
- साहिल


जब भी तुम्हारी देह में
यात्रा पर निकलता हूँ
मिलता है एक छुपा हुआ खजाना
मेरे लिप्सा संसार में
एक अपरिचित आनंद
- साहिल

लगती है प्यास

तुरंत बाद

जब तुम मुझे भर कर

चली जाती हो

- साहिल

Friday, August 1, 2008


आसमान से आंसू बरस रहे हैं
धरा मिलन को तरस रहे हैं
अब तो मिलने आ जाओ तुम
जीवन के कुछ बरस रहे हैं
साहिल