वह एक खुशबू .....
महकाती रही जो मन को
उजालों की आहट
परिंदों की चहचाहट
से लेकर
महकाती रही जो मन को
उजालों की आहट
परिंदों की चहचाहट
से लेकर
शाम ढलने
दीप जलने तक
वह एक रंगत ....
रंग गयी जो
मन के सागर को
एक रंगीली मछली की भान्ति
अपने सतरंगी रंग में
वह एक नगमा ...
हर पल गुनगुनाने को
जिसे जी चाहे
रागिनी खुद जिसका
मन बहलाए
वह एक स्पर्श ...
अंकित रहेगा
हृदय के कोरे कागज पर
नभ के उस एक छोर तक
सांस की अंतिम डोर तक
दीप जलने तक
वह एक रंगत ....
रंग गयी जो
मन के सागर को
एक रंगीली मछली की भान्ति
अपने सतरंगी रंग में
वह एक नगमा ...
हर पल गुनगुनाने को
जिसे जी चाहे
रागिनी खुद जिसका
मन बहलाए
वह एक स्पर्श ...
अंकित रहेगा
हृदय के कोरे कागज पर
नभ के उस एक छोर तक
सांस की अंतिम डोर तक
















