Friday, October 5, 2007


तुमसे मिलने के बाद

ऐसे तो कभी ना छुआ
हवा ने पहले मुझे
ना कभी सुने हवाओं के गीत
पहले भी तो चला था
पतझड़ से झरे
इन पत्तों से ढकी राह पर

आज सुनता हूँ इनकी धड़कनों से
निकलता शोर

कभी न की इतनी बातें
मुस्काते फूलों से
उड़ती धुल से आँखें बचाकर
नही निकलता अब
वरन करता हूँ उसका स्वागत
देह पर रम जाने को


ओस भी कोहरा भी
और शीत लहर
भिगो जाती है मेरी आत्मा को
और कोई मेरे भीतर मौन
स्वत लगता है खिलखिलाने

तारे कभी न लगे इतने उजले
आस्मान कभी न लगा इतना पास
और उसमे विचरते
परिंदों के संग
कभी न उड़ सका यूं पहले मैं

सांझ में छिपता
सूरज उड़ती गोधुली
गउओं के गले में बजती
घंटी के संग
कभी न नाचा मेरा हृदय
सच....
दुनिया कितनी खूबसूरत है
जाना ...
तुमसे मिलने के बाद
- साहिल

3 comments:

Internet Existence said...

सुनील जी स्‍वागत है मदमस्‍त कर देने वाली धुन है आपकी कविताओं में

ronnitbehel said...

I loved your poems sahil ! aap ka fan - ronit

Unknown said...

beautiful thought