उठो भी अब
मन में भी एक झरना बहता है
फैली असीम नीरवता के किस्से कहता है
कोयल की कूक में भी सुनता है
अपने चेतन का गायन
सफ़ेद रुई सा बगुला अपनी चोंच डालता है
दरिया के पानी में और उसके छींटे
पड़ते हैं मेरे भीतर
लताएँ, फूल, डालियाँ और पत्तों ने
कह दी कई अनकही गाथाएँ
और कोई बुद्ध ध्यानमग्न है ज्यों
नही उठेगा अब भोर होने से पहले
बूढे वृक्षों की लम्बी शाखाओं को
छू लेता है मेरा किलकारी मारता मन
उठो भी अब ...
नया जनम हुआ है !
- साहिल
3 comments:
awesome poetry Sahil. Well Done ! Keep up the good work !
very impressive. fine language! i love ur hindi!
खूबसूरत नज़्म
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