Saturday, August 2, 2008




याद है तुम्हे

तब तुम कहाँ थी

तब मैं कहाँ था

जब उस खंडहर की मुंडेर के किनारे

झील में दो प्रतिबिम्बों को देखकर

एक रहस्य मुस्कुरा रहा था

जब मैं लिख रहा था एक गीत

तुम्हारी देह पर अपने होंठों से

जब तुम्हारे सुवासित गेसुओं की सुगंध

मेरी साँसों में घुल रही थी

और तुम्हारी जिव्हा मेरी गर्दन पर

पिघल रही थी

मेरे हाथ जब तुम्हे कसकर पकडे हुए थे

जब तुम काट रही थी मेरे कन्धों को हौले से

याद है तुम्हे

तब तुम कहाँ थी

तब मैं कहाँ था

उस पल ....

- साहिल


3 comments:

Sajeev said...

स्वागत

नए चिट्टे की बहुत बहुत बधाई, लिखते रहें और हिन्दी चिट्टा जगत को अपने लेखन से समृद्ध करें, शुभकामनायें....

आपका मित्र
सजीव सारथी
09871123997

Anonymous said...

Very Beautiful Sahil ! U sooo Romantic !! Loved ur writings !!
Sonia

Anonymous said...

रूमानियत और कशिश के ख़ूबसूरत सैलाब सी लगी यह