
याद है तुम्हे
तब तुम कहाँ थी
तब मैं कहाँ था
जब उस खंडहर की मुंडेर के किनारे
झील में दो प्रतिबिम्बों को देखकर
एक रहस्य मुस्कुरा रहा था
जब मैं लिख रहा था एक गीत
तुम्हारी देह पर अपने होंठों से
जब तुम्हारे सुवासित गेसुओं की सुगंध
मेरी साँसों में घुल रही थी
और तुम्हारी जिव्हा मेरी गर्दन पर
पिघल रही थी
मेरे हाथ जब तुम्हे कसकर पकडे हुए थे
जब तुम काट रही थी मेरे कन्धों को हौले से
याद है तुम्हे
तब तुम कहाँ थी
तब मैं कहाँ था
उस पल ....
- साहिल
3 comments:
स्वागत
नए चिट्टे की बहुत बहुत बधाई, लिखते रहें और हिन्दी चिट्टा जगत को अपने लेखन से समृद्ध करें, शुभकामनायें....
आपका मित्र
सजीव सारथी
09871123997
Very Beautiful Sahil ! U sooo Romantic !! Loved ur writings !!
Sonia
रूमानियत और कशिश के ख़ूबसूरत सैलाब सी लगी यह
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