Saturday, July 18, 2009



शब् के जागे हुए तारों को नींद आने लगी
आप के आने की उम्मीद थी जाने लगी
रात भर दीद-ऐ-नमनाक में लहराते रहे
साँस की तरह से आप आते रहे जाते रहे
खुश थे हम अपनी तम्मनाओं का ख्वाब आयेगा
नजरें नीचे किए शर्मा हुए आएगा
जुल्फें चेहरे पे बिखराए हुए आएगा
पत्तियां खडकी तो हम समझे की आप आ ही गए
सुबह ने सेज से उठते हुए ली अंगडाई
अ सुबह तू भी जो आई तो अकेली आई
मेरे महबूब मेरे होश उडाने वाले मेरे मस्जूद मेरी रूह पर छाने वाले
आ भी जा ताके मेरे सजदे का आरमान निकले
आ भी जा तेरे कदमो पे मेरी जान निकले
- मखदूम




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