Sunday, April 11, 2010


सागर किनारे
ख्यालों के बादल
उस पार नाव खेते जा रहे हैं
सरसराती
हवा उन्हें
उनकी
मंजिल तक धकेल रही है
राह
में पत्थर हैं
नुकीली
यादों की तरह
हवा
भीगी हुई है
और
खिड़की से आकर मेरे बालों को छु रही है
मैं
बादलों को नयनो से थामे हूँ
रोशनी
है कि सो गयी है चादर तान कर
चाँद
सर पे खड़ा है
मुझे
सब याद है !
सागर
किनारे
हम
दोनों चुप
तारों
को देख रहे
हाथों
में लिए हाथ
तुमने
हौले से मेरा नाम पुकारा
मैंने
तुम्हे देखा
तुम हौले से मुस्काई
और
हौले से चूम लिया मुझको
मुझे
सब याद है
मेरी
साँसे थमी हैं
ये
अकेली रात और यादें
मेरी
आत्मा को लपेट लो
इस
रात को चूम लो .....

No comments: