Wednesday, August 6, 2008



उठो भी अब

मन में भी एक झरना बहता है

फैली असीम नीरवता के किस्से कहता है

कोयल की कूक में भी सुनता है

अपने चेतन का गायन

सफ़ेद रुई सा बगुला अपनी चोंच डालता है

दरिया के पानी में और उसके छींटे

पड़ते हैं मेरे भीतर

लताएँ, फूल, डालियाँ और पत्तों ने

कह दी कई अनकही गाथाएँ

और कोई बुद्ध ध्यानमग्न है ज्यों

नही उठेगा अब भोर होने से पहले

बूढे वृक्षों की लम्बी शाखाओं को

छू लेता है मेरा किलकारी मारता मन

उठो भी अब ...

नया जनम हुआ है !

- साहिल


3 comments:

Nawal said...

awesome poetry Sahil. Well Done ! Keep up the good work !

Anuradha said...

very impressive. fine language! i love ur hindi!

Anonymous said...

खूबसूरत नज़्म