Sunday, April 11, 2010


काश

काश तुम्हे कर पता मुक्त
इस पिंजरे से दूर कहीं नभ में ....
पा जाती तुम अपना विस्तार
कर पाती स्वपन पूर्ण, इच्छाएं साकार
नयन तुम्हारे और चंचल हो जाते
और अंग खिल के कँवल हो पाते
काश इन बन्धनों से दूर
कर पाती मेरे आलिंगन में विश्राम
देह कमनीय पा जाती सम्मान
जान पाती स्व अस्तित्व ...
वाणी तुम्हारी और झंकृत हो जाती
या फिर खिलखिलाकर ही तुम हंस पाती
नीर थमा है नयनो में जो
काश सुधा में बदल देता मैं
द्रष्टि पड़े जहाँ तुम्हारी
बसंत कर देता मैं
पुष्प हो बगिया है तुमारा निवास
कर रही क्या कंटको में
चली आओ मेरे पास
अनभिज्ञ हूँ क्यूँ ढालता भिन्न रूपों में
तुम्हारा रूप
अरुणारी सांझ में ज्यों
उठता पूनो का चाँद अनूप
क्यों हर क्षण स्पर्श तुम्हारा
महसूसता हूँ आस पास
मुख बिम्बित हर दिशा
तीव्र हो रही श्वास
सुगंध मुझको तुम्हारी छूती है
नहीं क्या ये प्रेम कि अनुभूति है ?



1 comment:

DR.S.P.SINGH. said...

Dil se likhte ho yaar