Friday, April 9, 2010







बच्चे बड़ों सी बातें करने लगे हैं
घर में सब खुश रहते हैं
कि उम्र से पहले ही 'स्मार्ट हो गए
और ........
बूढ़े बाबा की बातें सबको
बच्चों सी लगने लगी हैं ...!!

न धुंए के गुबार में, न मय की बेहोशी में
बेलगाम ख्वाइशे, कितनी देहों से परिचय
सबसे पूछा पता तेरा
इस वीराने में तू रहता था !
- साहिल

Thursday, October 29, 2009

पृथ्वी के सबसे खूबसूरत लोग

(ओशो ऑडिटोरियम के बाहर संध्या - ध्यान के समय )
पृथ्वी के सबसे खूबसूरत लोग
परी देश की कथाओं की तरह
आते हैं यहाँ
मौन धारे मुस्कुराते
जलते दीयों के बीच
संगीत की स्वर - लहरियों के संग
उठता है फ़िर एक उन्माद
और खो जाते हैं एक
अनजानी दुनिया में
जहाँ न संगीत रहता है
और न नृतक
बस फ़ैल जाता है नृत्य ही चारों तरफ़
और एक स्वर
मौन भाषा में करतें हैं स्वागत
एक रहस्य का
वो रहस्य...
जो परिचित है ... अपना है
बसा है कहीं अंतरतम में ...

- सुनील साहिल

जब तुम आती हो ...





जब तुम आती हो ....
बजने लगता है संगीत चारों ओर
छा जाता है सतरंग अनंत में
पंख फैलाये नृत्य करने लगते है मोर
नदिया में उठती है हिलोर
हृदय - धरा पर उतर जाती हो
जब तुम आती हो ....
थम जाती है झरनों की चाल
सरोवरों पर फूट पड़ता है किरणों का जाल
उग आते हैं पंख अचानक मेरी पीठ पर
तुम आसमान बन जाती हो
जब तुम आती हो ...
उग आता है पत्थरों के गर्भ से नरम घास
सूर्य आ बैठता है पास
घेर लेती हैं मुझे रंगीन तितलियाँ
केलि करने लगती है कुसुम - कलियाँ
गिलहरी सी चपला बन जाती हो
जब तुम आती हो ...
चांदनी रात में ही होने लगती है बरसात
लिपट जाते हैं बादल मुझसे
खिल जाती है धुप अचानक
कर लेती है आत्मसात
खिलखिला उठती है पृथ्वी
बतियाने लगते हैं सितारे
सारे के सारे
आकाश - गंगा बन जाती हो
जब तुम आती हो ...
तुम शकुन्तला का अनुराग
तुम गीतांजलि का राग
तुम उर्वशी का फाग
कामायनी की आग
तुम अजंता अलोरा ख्जुराह
कामदेव की चाह
तुम कुरान गीता
गंगा यमुन सरिता बन इठलाती हो
जब तुम आती हो ....जब तुम आती हो ....जब तुम आती हो ...
-- सुनील साहिल

Saturday, July 18, 2009



शब् के जागे हुए तारों को नींद आने लगी
आप के आने की उम्मीद थी जाने लगी
रात भर दीद-ऐ-नमनाक में लहराते रहे
साँस की तरह से आप आते रहे जाते रहे
खुश थे हम अपनी तम्मनाओं का ख्वाब आयेगा
नजरें नीचे किए शर्मा हुए आएगा
जुल्फें चेहरे पे बिखराए हुए आएगा
पत्तियां खडकी तो हम समझे की आप आ ही गए
सुबह ने सेज से उठते हुए ली अंगडाई
अ सुबह तू भी जो आई तो अकेली आई
मेरे महबूब मेरे होश उडाने वाले मेरे मस्जूद मेरी रूह पर छाने वाले
आ भी जा ताके मेरे सजदे का आरमान निकले
आ भी जा तेरे कदमो पे मेरी जान निकले
- मखदूम




Wednesday, August 6, 2008



उठो भी अब

मन में भी एक झरना बहता है

फैली असीम नीरवता के किस्से कहता है

कोयल की कूक में भी सुनता है

अपने चेतन का गायन

सफ़ेद रुई सा बगुला अपनी चोंच डालता है

दरिया के पानी में और उसके छींटे

पड़ते हैं मेरे भीतर

लताएँ, फूल, डालियाँ और पत्तों ने

कह दी कई अनकही गाथाएँ

और कोई बुद्ध ध्यानमग्न है ज्यों

नही उठेगा अब भोर होने से पहले

बूढे वृक्षों की लम्बी शाखाओं को

छू लेता है मेरा किलकारी मारता मन

उठो भी अब ...

नया जनम हुआ है !

- साहिल


Tuesday, August 5, 2008


पल पल रूपल

फडफडा रहा है

तुम्हारी यादों का पंछी

मेरे जेहन में और ले जाता है

मेरा हाथ पकड़कर

तुम्हारी सुवास के आकाश में

तुम्हारे अक्स की छुअन

टटोलती है मेरी चेतना को

और तुम्हारी आवाज की मिश्री

घुल जाती है मेरी श्वास में

तुम्हारे आलिंगन के छोटे छोटे पाँव

दौड़ रहे हैं मेरी देह में अब भी

बरस रही हो बूँदें बनकर

मेरे हृदय के आँगन में

तैर रहा हूँ आँखें मूंदें

तुम्हारी स्मृतियाँ के अनंत में

की गिरा देता है ज़मीन पर एक हाथ

मेरी पीठ थपथपाकर और कहता है -

'ऐ ...चलना नही है क्या ?'

और मैं हूँ कि बुदबुदा उठता हूँ -

' हाँ..चलना तो है

वो भी यदि साथ चले तो...

और पीछे मुड़कर देखता हूँ तो बस

एक ख्वाब खड़ा मुस्करा रहा था ....

- साहिल

Monday, August 4, 2008


झंकृत हो गयी देह, छेड़े जब से तुने तार !!

स्वयं से हो गया नेह, अब आ पाउँगा उस पार !!

Saturday, August 2, 2008

SAHIL's poem..on NDTV
www.ndtv.com/ent/bookspoetrycorner.asp?id=997

for SUNIL SAHIL's Hindi Poems -

http://www.anubhuti-hindi।org/kavi/s/sunil_sahil/index.htm




याद है तुम्हे

तब तुम कहाँ थी

तब मैं कहाँ था

जब उस खंडहर की मुंडेर के किनारे

झील में दो प्रतिबिम्बों को देखकर

एक रहस्य मुस्कुरा रहा था

जब मैं लिख रहा था एक गीत

तुम्हारी देह पर अपने होंठों से

जब तुम्हारे सुवासित गेसुओं की सुगंध

मेरी साँसों में घुल रही थी

और तुम्हारी जिव्हा मेरी गर्दन पर

पिघल रही थी

मेरे हाथ जब तुम्हे कसकर पकडे हुए थे

जब तुम काट रही थी मेरे कन्धों को हौले से

याद है तुम्हे

तब तुम कहाँ थी

तब मैं कहाँ था

उस पल ....

- साहिल



चलो आओ नृत्य करें
रात्री के गीत के लिए
अपनी देहों के साथ
गुथे हुए
- साहिल


जब भी तुम्हारी देह में
यात्रा पर निकलता हूँ
मिलता है एक छुपा हुआ खजाना
मेरे लिप्सा संसार में
एक अपरिचित आनंद
- साहिल

लगती है प्यास

तुरंत बाद

जब तुम मुझे भर कर

चली जाती हो

- साहिल

Friday, August 1, 2008


आसमान से आंसू बरस रहे हैं
धरा मिलन को तरस रहे हैं
अब तो मिलने आ जाओ तुम
जीवन के कुछ बरस रहे हैं
साहिल

Friday, October 5, 2007


तुमसे मिलने के बाद

ऐसे तो कभी ना छुआ
हवा ने पहले मुझे
ना कभी सुने हवाओं के गीत
पहले भी तो चला था
पतझड़ से झरे
इन पत्तों से ढकी राह पर

आज सुनता हूँ इनकी धड़कनों से
निकलता शोर

कभी न की इतनी बातें
मुस्काते फूलों से
उड़ती धुल से आँखें बचाकर
नही निकलता अब
वरन करता हूँ उसका स्वागत
देह पर रम जाने को


ओस भी कोहरा भी
और शीत लहर
भिगो जाती है मेरी आत्मा को
और कोई मेरे भीतर मौन
स्वत लगता है खिलखिलाने

तारे कभी न लगे इतने उजले
आस्मान कभी न लगा इतना पास
और उसमे विचरते
परिंदों के संग
कभी न उड़ सका यूं पहले मैं

सांझ में छिपता
सूरज उड़ती गोधुली
गउओं के गले में बजती
घंटी के संग
कभी न नाचा मेरा हृदय
सच....
दुनिया कितनी खूबसूरत है
जाना ...
तुमसे मिलने के बाद
- साहिल